आज के समय में कबीर विषय पर मोती लाल नेहरू सांध्य में हुआ सेमिनार । काफी संख्या में छात्र छात्राएं रहे मौजूद

मोतीलाल नेहरू सांध्य कॉलेज में आज एक दिवसीय सेमिनार का आयोजन किया गया। इस सेमिनार के मुख्य अतिथि के रूप में दिल्ली विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के प्रोफेसर डॉ अनिल राय थे । कार्यक्रम की विधिवत शुरुआत मोतीलाल नेहरू सांध्य कॉलेज की प्रिंसिपल डॉ विचित्रा गर्ग ने की उन्होंने कहा कि कबीर को हम बचपन में सुनते थे, कबीर हिन्दू भी थे मुस्लिम भी थे । लेकिन कबीर दोनों ही आडंबरों के खिलाफ थे । कबीर के दोहे को अपने जीवन में लेने से जिंदगी सफल हो जाती है। हमें कबीर को अपने जीवन में आत्मसार करना चाहिए। एक समय ऐसा आया जब भक्ति आंदोलन समय की जरूरत बन गया।

प्रो अनिल राय का परिचय देते हुए वरिष्ठ प्राध्यापक डॉ विद्याशंकर सिंह ने कहा कि अनिल राय इसी विश्वविद्यालय में आपकी पढ़ाई और फिर फिर अध्यापक कार्य भी यहां से किया । अनिल राय बलिया से है । जहां से पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर , आदि रहे। 2001 – निर्गुण काव्य में नारी पहली पुस्तक , 12 शोध पत्र । देश की महत्वूर्ण पत्रिकाओं में 50 निबंध प्रकाशित हुए।

कार्यक्रम में प्रोफेसर डॉ अनिल राय ने कहा कि कबीरदास राम और रहीम की बात करते है। कबीर ने माया के अनेक रूप बताया है । आज के समय में हमें कबीर को दूसरे संदर्भ में देखने की जरूरत है। प्रो अनिल राय ने बच्चों को समझाने के लिए ‘ये दिल मांगे मोर’ और ‘मैं चाहे ये करूँ, मैं चाहे वो करूँ मेरी मर्जी ‘ जैसी पंक्तियों को , जो कि युवाओं में काफी प्रचलित हैं। जैसे उदाहरण देकर यह सिद्ध किया कि हमेशा साहित्यक उदाहरण से ही बात को साबित नहीं किया जा सकता बल्कि एक सक्रिय अध्यापक नित नए उदाहरणों का अविष्कार करता है।

प्रो अनिल राय ने किसान की मजबूरी , अन्न की महत्ता, इच्छाओं की सीमा, बेरोजगार की पीड़ा, वैश्या की पहचान और सत्ता की भूख को आज के समय में जिस तरह से प्रतिपादित किया वह अद्भुत था। शायद ही किसी ने सोचा होगा कि बेरोजगारी की समस्या को कोई “मुसि मुसि रोवे कबीर की माई” के माध्यम से व्याख्यायित कर सकता है । प्रो राय ने बड़ी आसान भाषा में कविता के जन्म की ‘दर्दीली’ कहानी बताई । सभी इस संदर्भ में बाल्मीकि के ‘यत्क्रौंच मुथुनादेकम्…’ का उदहारण देते हैं लेकिन आपने उनकी जगह एक शायर का उद्धरण लेकर यह सिद्ध किया कि कब, कहाँ, कौन सी बात, किस सलीके से कही जाती है ,हो अगर यह सलीका पता तो फिर हर बात सुनी जाती है । कबीर को नारी विरोधी कहने वालों के विरोध में जो आपने जो तर्क दिया वह साहित्यिक एवम व्यवहारिक दोनों दृष्टि से प्रबल था।

कार्यक्रम के अंत में प्रो. कान्हाराम मीणा ने धन्यवाद ज्ञापन देते हुए कहा कि आज के समय में जब राजनीति में इतनी उथल पुथल है। उस समय में हमने कबीर से सीखना चाहिए । सबसे बड़ी बात मनुष्य को मनुष्य से प्रेम करना चाहिए । कबीर ने हिंदी मुस्लिम एकता का संदेश दिया ।

कार्यक्रम के दौरान काफी संख्या में छात्र – छात्राएं मौजूद रहे । शोध छात्र सतेंद्र शुक्ल , शिखा गर्ग, विशाल मिश्र, अमन कुमार, अनिल महतो , ज्योत्स्ना तथा गौरव आदि  दिल्ली विश्वविद्यालय के  शोधार्थी इस दौरान मौजूद रहे ।

न्यूज सॉर्स : सतेंद्र शुक्ल के द्वारा ( दिल्ली विश्वविद्यालय के शोधकर्ता )

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