एक ऐसी बुराई जो सभी पुण्य कर्मों को कर देता है बेकार, सबको रहना चाहिए इससे दूर

एक आश्रम में शिष्य तथा संत के मध्य स्वर्ग-नर्क को लेकर चर्चा चल रही थी. तभी एक शिष्य ने पूछा- ‘गुरुदेव मेरी मृत्यु के पश्चात क्या मैं स्वर्ग जा पाउँगा?’

संत के द्वारा शिष्य को जवाब दिया गया कि- ‘जब मैं जाएगा, तभी तो आप स्वर्ग जा पाओगे.’ ऐसा उत्तर सुनते ही शिष्य को लगा कि स्वामीजी को अहंकार हो गया है, अतः ऐसा उत्तर दे रहे हैं.’ तब शिष्य ने गुरूजी के इस बात की शिकायत आश्रम के ही बड़े महात्माजी से कर दी.’

महात्माजी को ये ज्ञात था कि वो संत कभी भी अभिमानी नहीं हो सकते, वे अपनी बातों को कम शब्दों में कहते हैं. तब महात्माजी ने संत व उनके शिष्य को बुलाकर पूरी बात पूँछी. महात्माजी के द्वारा संत से पूछा गया, बताइये क्या आप स्वर्ग जाओगे? संत ने उत्तर दिया कि- ‘जब मैं जाएगा, तभी तो मैं स्वर्ग जाऊंगा.’

महात्माजी संत की उस बात को समझ गए जो उन्होंने शिष्य से कहा था. फिर उन्होंने शिष्य को समझाया कि इनके कहने का तात्पर्य ये है कि जब ‘मैं’ यानी अहंकार जाएगा, तभी हम लोग स्वर्ग के अधिकारी हो सकेंगे. मन में जब तक अहंकार रहेगा, तब तक हमारे समस्त पुण्य कर्म बेकार हो जाते हैं, पूजा-पाठ भी निष्फल रह जाती है. कोई अहंकारी व्यक्ति यदि दिन-रात भी पूजा-पाठ करेगा, तब भी उसको स्वर्ग की प्राप्ति नहीं हो सकती है. अतः हमें इस बुराई से सदैव ही बचना चाहिए.

इस प्रसंग से हमें ये सीख मिलती है कि- ‘अपने अच्छे कर्मों पर अहंकार न करें. कभी भी स्वयं की तारीफ न करें. जब भी किसी व्यक्ति की सहायता करें तो उसको इस बात का अहसास न करवाएं.

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