जब धर्मराज ने ली गुरु विश्वामित्र की परीक्षा तो क्या हुआ था ? पढ़े खबर

एक समय की बात है, कौशिक वंश में महाराजा गाधि के पुत्र विश्वरथ हुए। जिन्होंने महर्षि वशिष्ठ के साथ कामधेनु गाय के लिए युद्ध किया और हार गए। उस कारण से उन्हें यह अहसास हुआ कि क्षत्रिय बल से ब्रह्म बल उत्तम है.इसलिए उन्होंने कठिन तपस्या की और ब्रह्मर्षि पद प्राप्त किया था. ब्रह्मर्षि पद प्राप्त करके वह सारे विश्व में विश्वामित्र नाम से जाने गए।

एक समय की बात है, देवताओं ने विश्वामित्र की परीक्षा लेने का विचार किया। इस कार्य के लिए स्वयं धर्मराज वशिष्ठजी का स्वरूप धारण करके विश्वामित्र के आश्रम में आये। उनका शरीर बहुत सुख गया था। उन्हें देखकर लगता था कि कई दिनों से उन्होंने भोजन नहीं किया है।

वशिष्ठ बने धर्मराज ने विश्वामित्र से भोजन देने को कहा। विश्वामित्र उठे और वशिष्ठजी के लिए स्वयं भोजन बनाने लगे। भोजन बनाने में विश्वामित्र से विलंब हो गया तो धर्मराज ने दुसरे ऋषियों से भोजन लेकर खा लिया और वहां से चले गए। जब विश्वामित्र भोजन लेकर वशिष्ठजी के समक्ष गए तो उन्होंने देखा कि वहां कोई नहीं था। इसलिए फिर विश्वामित्र वहीँ पर वशिष्ठजी की प्रतीक्षा करने लगे।

वशिष्ठजी प्रतीक्षा करते हुए विश्वामित्र को वहा पर खड़े खड़े सौ वर्ष जितना समय व्यतीत हो गया। विश्वामित्र वहां पर सौ वर्षो तक भूखे और प्यासे खड़े रहे। विश्वामित्र के इस कठिन कार्य से धर्मराज विश्वामित्र पर प्रसन्न हुए और फिर से वशिष्ठ ऋषि का रूप धारण करके वहां पर आये और वह विश्वामित्र का बनाया हुआ वह भोजन उन्होंने ग्रहण किया। सौ वर्ष व्यतीत हो जाने पर भी वह भोजन उसी उत्तम अवस्था में था जब उसे विश्वामित्र ने बनाया था। उसके बाद धर्मराज ने विश्वामित्र की प्रसंसा की और अपना वास्तविक स्वरूप दिखाकर वहां से अन्तर्धान हो गए।

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