पुस्तक दिवस के अवसर पर डीयू में गुजरात के राज्यपाल तथा सुनील आंबेकर का व्याख्यान

अनंत आकाश की गहराईयों में जब भी हम मनुष्य आशा भरी निगाहों से संचित ज्ञान परम्परा को ग्रहण करने का प्रयास करते हैं,तो हमारे पूर्वजों ने शब्द परम्परा से जिस ज्ञान को हमारे लिए संचित किया, वह हमारा आधार बनता है।अक्षर,शब्द या वाक्य ही उन जिज्ञासाओं को शांत करके हमें ज्ञान के प्रकाश से परिपूर्ण पथ को दिखलाते हैं।

जब भी हम सभी मानव समाज के लिए सर्वश्रेष्ठ आविष्कारों के विषय में सोचेंगे तो निश्चित ही पुस्तक संस्कृति को हम उन सबमें एक पायेंगे।प्राचीनकाल के भारत में ऋषियों-मुनियों ने मानव कल्याणकारी विचारों को अनेक संसाधनगत अभावों के उपरांत भी भोजपत्रों तथा श्रुतिपरम्परा के माध्यमों से जीवित रख भारतीय समाज को नई राह दिखाई,यह बात अलग है कि हमारी वर्तमान शिक्षा पद्धति तथा भूमंडलीकरण आदि कारकों ने इस तथ्य पर पर्दा डालने का कार्य किया है।

#विश्वपुस्तकदिवस के अवसर पर दिल्ली विश्वविद्यालय के पुस्तकालय एवं सूचना विज्ञान विभाग द्वारा आयोजित 72 वें वार्षिकोत्सव पर विश्वविद्यालय में आयोजित कार्यक्रम में गुजरात के राज्यपाल श्री ओम प्रकाश कोहली जी तथा श्री Sunil Ambekar जी के द्वारा पुस्तक संस्कृति पर विचारों से युवाओं ने नये सूत्रों को प्राप्त किया |

श्री सुनील आम्बेकर जी ने पुस्तकालयों की प्राचीन भारत में उपस्थिति को नालन्दा-तक्षशिला विश्वविद्यालयों की समृद्ध पुस्तक-संस्कृति की विरासत तथा वाचनालय परम्परा के उदाहरण के माध्यम से पुष्ट करते हुए विश्व की सबसे बड़ी युवाशक्ति सम्पन्न देश की सकारात्मक चेतना के निर्माण में पुस्तकालयों की महत्वपूर्ण भूमिका होने की बात रखी तथा #NewIndia के सपने को साकार करने हेतु युवाओं को अंक अर्जन तक सीमित न रहकर ज्ञान-विज्ञान की समृद्ध विरासत को जीवन में व्यवहारिक रूप से आत्मसात् करने का संदेश दिया।

श्री ओ पी कोहली जी ने पुस्तकालयों को ‘कुम्हार की चाक’ की भाँति माना, जो कि युवाओं का भविष्य गढ़ने का आधार होते हैं,युवाओं की सकारात्मक चेतना निर्माण से राष्ट्र समृद्धता को प्राप्त करेगा ,ऐसा सूत्र उन्होंने दिया तथा अपेक्षित सुधारों पर भी उनका ध्यान रहा।

बदलते भारत में पुस्तक-संस्कृति नये आयामों का अर्जन करे,इस आशा के साथ ।

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