देश के मुस्लिमों में बेचैनी का अहसास और असुरक्षा की भावना है। – Hamid Ansari

पूर्व उप-राष्ट्रपति Hamid Ansari ने ‘स्वीकार्यता के माहौल’ को खतरे में बताते हुए कहा है कि देश के मुस्लिमों में बेचैनी का अहसास और असुरक्षा की भावना है। ये एक ऐसे उप-राष्ट्रपति है जो कहने को तो भारत के उप-राष्ट्रपति थे लेकिन ये असल में मुस्लिमो के उप-राष्ट्रपति थे इनके बयानों से यही लगता है।

जब मनमोहन सिंह ने कहा था की देश की सम्पत्ती से सबसे पहला अधिकार मुसालमानो का हैं, हिन्दू तब भी ड़रे हुए थे और आज भी हैं, जहा  सारा कश्मीर खाली हो गया हिन्दूओ से तब एहसास नहीं हुआ तब मुस्लिमो के उपराष्ट्रपति Hamid Ansari के मुह से आवाज नहीं निकली। आप मुस्लिमों को राय क्यों नहीं देते कि हिन्दुओ से लड़ना बन्द करे, हिन्दुओ के धार्मिक काफिलों पर हमला करना बंद करें, देश का, देश के झंडे का, देश के राष्ट्रगान का सम्मान इज्जत करे।

मुस्लिमो की समस्या ही यही है कि वो अपने को पीड़ित समझते है, जैसे कि सविधान मे समानता न मिली हो, उनके लिये अलग कानून बने हों, उन्हे संसद विधानसभा या बड़े पदो पर मनाही हो, एक बात सोचने वाली है कि ऐसे ही वक्तव्यों से मुस्लिम भाई पीड़ित की भावना से ऊपर नही उठ पा रहे हैं, ये शायद राजनेताओं को ज्यादा सूट करता है।

जब तक Hamid Ansari उपराष्ट्रपति थे सब ठीक था लेकिन इनको उप-राष्ट्पति नही बनाया तो सब कुछ बदल गया। अंसारी साहब पूरा विश्व घूम कर देख लीजिए शायद किसी अन्य धर्मनिरपेक्ष देश में अल्पसंख्यकों को भारत से अधिक धार्मिक आजादी होगी। अपने पड़ोसी चीन में ही देख लीजिए जहाँ मुसलमानों को अन्य नागरिकों की ही तरह रहना पड़ता है।

उनके दाढ़ी रखने, एक से अधिक शादी करने, एक से अधिक बच्चा पैदा करने, और औरतों के बुरका पहनने पर भी रोक है यहां तक कि चीन के होटलों में उसके मित्र पाकिस्तान के नागरिकों तक के रुकने पर प्रतिबंध है। अगर आपको अल्पसंख्यकों की स्थिति ही देखनी है तो जरा बांग्लादेश और पाकिस्तान में हिन्दू अल्पसंख्यकों की हालत देख लीजिए कि वहां वे कितनी अमानवीय स्थितियों में रह रहे है। यह भाषा दिग्विजय, ओवैसी, मुलायम या आजमखान बोले तो यह उनकी राजनीतिक मजबूरी है।

लेकिन देश के निवर्तमान उपराष्ट्रपति से ऐसे गैरजिम्मेदाराना बयान की उम्मीद नहीं कि जाती।

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